दक्षिण के कालाभीर या कालाभ्र स्थानिक जनजाति
दक्षिण के कालाभीर या कालाभ्र स्थानिक जनजाति के थे और उनके नाम मे काला शब्द उनके शरीर के वर्ण से प्रेरित था। कालाभ्र भी म्लेच्छ अभीर की तरहा ही अत्यंत क्रूर होने के साथ हिन्दू वैदिक संस्कृति के अत्यंत विरोधी तथा बुद्धिष्ट व समनार विचारधारा के कट्टर समर्थक थे। रोमन इतिहासकार प्लीनी ने १ली शताब्दी मे उन्हे Caelobothras कहा है जो सम्राट अशोक द्वारा नामांकित केरालापुत्रो (Sons Of Kerala) का ही विदेशी अपभ्रंश है। कालाभ्रो ने हिन्दू शाशन व समाज व्यवस्था को तितरबितर कर दिया था तथा उनके आतंक के चलते इतिहास मे उन्हे बर्बर, असामाजिक व सभ्य समाज (Civilization) के शत्रु करार दिया गया है। उनके युग को भी दक्षिण के इतिहास मे अंधकार युग या ‘Kalabhra Interregnum’ से जाना जाता है। उनके दुराचारो से त्रस्त होकर समस्त दक्षिण भारत (मुख्यतः तामिलनाडू) के हिन्दू समाज के धनगर चोल वंश, ब्राह्मण, वैश्य व अन्य सभी वर्गो ने एक साथ मिलकर उनसे प्रचंड संघर्ष किया और उन्हे उखाड़ फेंका। श्रीलंका मे हिन्दू एव बौद्ध विचारधारा मे चल रहे संघर्ष के मूल भी इसी अंतर्विग्रह मे देखे जाते है। दक्षिण के मुदिराजा कोली कालाभ्र के वंशज माने जाते है।
बुद्धिष्ट साहित्य मे कालाभ्र काल के स्थानिक जनजातीय दस्यु पुल्ली का भी उल्लेख मिलता है जिसे ‘कोलावर’ दर्शाया गया है यह ‘कलवार’ के अर्थ मे नहीं परंतु स्थानीय भाषामे किसी को मारने की अदम्य इच्छा वाला या हिंसक प्रकृति का व्यक्ति के अर्थ मे कहा गया है। वर्तमान मे अति प्रसिध्ध हुए ‘कोलवारी दी’ गाने मे भी कोलवारी शब्द इसी अर्थ मे है।
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