रिजेर्वेशन तो बहाना है, नहि तो असली मकसद तो सभी पशुपालक जातियो को धनगर नाम से एकत्रित करना है।
हम जिस बदलाव की बात करते हैं वह बड़ी अजीब चीज है| बदलाव दिखाई नहीं देता| जैसे हवा दिखायी नहीं देती लेकिन हवा को अनुभव किया जा सकता है| ठिक उसी प्रकार बदलाव को भी अनुभव किया जा सकता हैं| सामाजिक कार्यक्र्ताओ के कार्य से ८५ प्रतिशत धनगर समाज में चेतना आ रही है| धनगर समाज अपने अधिकारों की मांग कर रहा है| यह वास्तव में आत्मसम्मान की लड़ाई हैं| रिजेर्वेशन तो बहाना है, नहि तो असली मकसद तो सभी पशुपालक जातियो को धनगर नाम से एकत्रित करना है।
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